Author: newswriters

डॉ. सुशील उपाध्याय।मौजूदा मीडिया पर जब आप एक सरसरी निगाह डालते हैं तो भौचक्का हुए बिना नहीं रह सकते। हर रोज देखते हैं कि हमारे टीवी चैनल रेडियो की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वे बहुत लाउड हैं। जैसे सब कुछ शब्दों के जरिये ही कह देना चाहते हैं। अक्सर ऐसा लगता है कि वे अपने मीडिया-माध्यम को ही बेमतलब बनाने पर तुले हैं। बात यहीं पर खत्म नहीं होती। फिल्म माध्यम टीवी की तरह हो गया है। हमेशा बोलते रहना ही सब कुछ मान लिया गया है। जबकि, जरूरत इस बात की है कि जो मीडिया जिसके लिए बना…

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डॉ. महर उद्दीन खां।माली जिस प्रकार गुलदस्ते का आकर्षक बनाने के लिए सुंदर-सुंदर फूलों का चयन करता है उसी प्रकार पत्रकार को भी अपनी खबर के गुलदस्ते को आकर्षक बनाने के लिए सुंदर, संक्षिप्त और सरल शब्दों का चयन करना चाहिए। भारी भरकम शब्दों के प्रयोग से खबर बोझिल हो जाती है और फिर वह गुलदस्ता न रह कर कचरा पेटी बन जाती है। उदाहरण स्वरुप अगर फायर ब्रिगेड या अग्निशमन दल के स्थान पर दमकल लिखा जाए तो ठीक रहेगा। आज अखबारों में कलम से लिखने का चलन समाप्त हो रहा है। अधिकांश पत्रकार कम्प्यूटर पर सीधे लिखते हैं।…

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मनोज कुमार।पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता पहली शर्त होती है। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि समाचार पत्र समाज के लिये एक नि:शुल्क पाठशाला होती है। समाचार पत्रों के माध्यम से हर उम्र वर्ग के लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैंसंडे स्पेशल शीर्षक देखकर आपके मन में गुदगुदी होना स्वाभाविक है। संडे यानि इतवार और स्पेशल मतलब खास यानि इतवार के दिन कुछ खास और इस खास से सीधा मतलब खाने से होता है लेकिन इन दिनों मीडिया में संडे स्पेशल का चलन शुरू हो गया है। संडे स्पेशल स्टोरी इस तरह प्रस्तुत की जाती है मानो पाठकों को खबर…

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अन्नू आनंद।बाजारी ताकतों का पत्रकारिता पर प्रभाव निरंतर बढ़ा है। प्रिंट माध्यम हो या इलेक्ट्रॉनिक अब विषय-वस्तु (कंटेंट) का निर्धारण भी प्रायः मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है। कभीसंपादकीय मसलों पर विज्ञापन या मार्केटिंग विभाग का हस्तक्षेप बेहद बड़ी बात मानी जाती थी।प्रबंधन विभाग संपादकीय विषयों पर अगर कभी राय-मशविरा देने की गुस्ताखी भी करते थे तो वहएक चर्चा या विवाद का विषय बन जाता था और यह बात पत्रकारिता की नैतिकता के खिलाफमानी जाती थी।लेकिन यह बातें अब अतीत बन चुकी हैं। अब अखबार या चैनल के पूरे कंटेंट में मार्केटिंग वालोंका दबदबा अधिक दिखाई पड़ता है।…

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संजय कुमार।हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। कई अखबारों ने भी इस प्रारूप को अपनाया है खासकर हिन्दी के पाठकों को ध्यान में रख कर भाषा का प्रयोग होने लगा है।शुरुआती दौर की हिन्दी पत्रकारिता की भाषा साहित्य की भाषा को ओढे हुए थी। ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता साहित्य के बहुत करीब…

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सुरेश नौटियाल।कई साल पहले, ब्रिटिश उच्चायोग के प्रेस एवं संपर्क विभाग ने नई दिल्ली में “भाषाई पत्रकारिता: वर्तमान स्वरूप और संभावनाएं“ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया था। जनसत्ता के सलाहकार संपादक प्रभाष जोशी ने इस गोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा था कि मैंने अपनी जिंदगी के नौ साल अंग्रेजी पत्रकारिता में व्यर्थ किए, क्योंकि इस देश में जनमत बनाने में अंग्रेजी अखबारों की भूमिका नहीं हो सकती है। इसी आख्यान में आदरणीय प्रभाष जोशी जीने कहा था कि अंग्रेजी इस देश में सोचने-समझने की भाषा तो हो सकती है लेकिन महसूस करने की नहीं। और जिस भाषा के…

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अभिषेक श्रीवास्‍तव।”मेरे ख्‍याल से हमारे लिए ट्विटर की कामयाबी इसमें है, जब लोग इसके बारे में बात करना बन्‍द कर दें, जब हम ऐसी परिचर्चाएं करना बन्‍द करें और लोग इसका इस्‍तेमाल सिर्फ एक उपयोगितावादी औजार के रूप में करने लगें, जैसे वे बिजली का उपयोग करते हैं। जब वह सिर्फ संचार का एक हिस्‍सा बनकर रह जाए और खुद पृष्‍ठभूमि में चला जाए। किसी भी संचार उपकरण की तरह हम इसे भी उसी स्‍तर पर रखते हैं। यही बात एसएमएस, ईमेल, फोन के साथ भी है। हम वहां पहुंचना चाहते हैं।” -जैक डोर्सी, सह-संस्‍थापक और कार्यकारी, ट्विटर, फ्यूचर ऑफ…

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आशीष कुमार ‘अंशु’।भारतीय मीडिया का अर्थ नेपाल की नजर में वे सभी भारतीय खबरिया चैनल है, जो चौबीस घंटे सात दिन खबर देने का दावा करते हैं। इसमें अखबार और वेवसाइट शामिल नहीं है। इसलिए जब नेपाल में मीडिया के प्रति गुस्सा प्रकट करने की बात सामने आती है तो यही माना जाना चाहिए कि यह भारतीय इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रति जाहिर किया जाने वाला गुस्सा है। पिछले दिनों नेपाल से कुछ इलेक्ट्रानिक चैनलों को बंद किए जाने की भी खबर आई थी।धर्मनिरपेक्ष बना देश नेपाल इन दिनों अपने नए संविधान को बनाने में व्यस्त है। जब नया संविधान तैयार…

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सुभाष धूलियापरंपरागत रूप से बताया जाता है कि समाचार उस समय ही पूर्ण कहा जा सकता है जब वह कौन, क्‍या, कब, कहां, क्‍यों, और कैसे सभी प्रश्‍नों या इनके उत्‍तर को लेकर लोगों की जिज्ञासा को संतुष्ट करता हो। हिंदी में इन्‍हें छह ककार के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी में इन्‍हें पांच ‘डब्‍ल्‍यू; हू, व्‍हाट, व्‍हेन, वहाइ वे तलाशना और पाठकों तक उसे उसके संपूर्ण अर्थ में पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती का कार्य है। यह एक जटिल प्रक्रिया है। पत्रकारिता और समाचारों को लेकर होने वाली हर बहस का केंद्र यही होता है कि इन छह प्रश्‍नों…

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दिलीप मंडल 
पब्लिक रिलेशन वैसे तो पुरानी विधा है लेकिन आधुनिक कॉरपोरेट पब्लिक रिलेशन की शुरुआत 20वीं सदी के पहले दशक से हुई। पब्लिक रिलेशन का इतिहास लिखने वाले कई लोग आईवी ली को पब्लिक रिलेशन का जनक मानते हैं। कुछ इतिहास लेखक यह श्रेय एडवर्ड बर्नेस को देते हैं।आईवी ली ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में पत्रकार के तौर पर काम किया था। उसने न्यूयॉर्क अमेरिकन, न्यूयॉर्क टाइम्स और न्यूयॉर्क वर्ल्ड में पत्रकार के तौर पर काम किया और मुख्य रूप से आर्थिक और कारोबारी विषयों पर लिखा। वे खुद लिखते हैं कि कम तनख्वाह और देर तक…

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