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Author: newswriters
नीरज कुमार।हम विकास की राजनीति करते हैं। राजनीतिक पार्टियों में यह जुमला इन दिनों आम है। मई 2014 में लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे के ईर्द-गिर्द लड़ागया। विकास का संबंध ऐसी अर्थव्यवस्था से है, जिसमें समाज के हर वर्ग को आर्थिक रूप से सशक्त होने का मौक़ा मिले। ऐसे में पत्रकारिता को समाज के आर्थिक पहलू से अलग करकेनहीं देखा जा सकता है। मौजूदा दौर में आर्थिक पत्रकारिता की अहमियत काफी बढ़ गई है। सरकार अवाम से किया वादा पूरा कर रही है या नहीं, यह जानने के लिए सरकार के आर्थिक फैसलों और कामकाज को कसौटी पर कसा…
महेश शर्मा।देश की करीब सवा सौ करोड़ आबादी के लिए दो जून की रोटी जुटाने वाले ग्रामीण किसान की लाइफ स्टाइल आजादी के इतने वर्ष बाद भी हमारी मीडिया की विषय वस्तु नहीं बन सकी है। वास्तविकता यह है कि मीडिया से गांव दूर होते जा रहे हैं। परिणाम स्वरूप वहां बसने वाले गरीब और किसान की समस्याओं को लेकर संजीदगी नहीं दिखती। इसके पीछे मीडिया संस्थानों की बाजारू प्राथमिकताएं जिम्मेदार तो हैं ही, ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे शिक्षित प्रशिक्षित पत्रकारों का भी अभाव है, जो ग्राम्य जीवन की कठिनाइयों को बेहतर ढंग से समझ कर उठा सकें।ऐसे माहौल व…
शशि झा।मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता रहा है। पर विडंबना यह है कि प्रिंट से लेकर इलैक्ट्रानिक तक कमोबेश इनके सभी अहम समूहों के मालिक बड़े पूंजीपति, उद्योगपति और बड़े बिजनेसमैन रहे हैं। कोढ़ मे खाज यह है कि पिछले कुछ वर्षों में चिट फंड, रियल एस्टेट से जुड़े धंधेबाजों ने मीडिया पर लगभग एकाधिकार ही कर लिया है। ऐसी सूरत में पत्रकारिता या लेख के टॉपिक की बात करें तो बिजनेस रिपोर्टिंग यानी कॉरपोरेट, फाईनेंशियल या कॉमर्स रिपोर्टिंग कितने प्रकार के दबाव से गुजरती होगी, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। वैश्विक अर्थव्यवस्था लगातार अपनी…
इरा झा।उग्रवाद प्रभावित इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए संयम, कल्पनाशीलता, धैर्य, जी-तोड़ मेहनत और अटूट लगन की आवश्यकता होती है। इनमें सामान्य खबरों की तरह कुछ भी और कभी भी नहीं लिखा जा सकता। यह काम बेहद जोखिम भरा है, लिहाजा इस वास्ते सावधानी और तथ्यों तथा स्रोतों की लगभग मुकम्मिल पुष्टि जरूरी है। ऐसी खबरें पढ़ते हुए लोग संवाददाता की पीछे की मेहनत का अंदाजा नहीं लगा सकते।आम हिंसा की रिपोर्टिंग के लिए तो न्यूज एजेंसी, पुलिस और स्थानीय लोग हैं। उग्रवादी या विद्रोही संगठन से संबंधी रिपोर्टिंग में खास सावधानियां आवश्यक हैं। अपने नेता से मुलाकात का समय…
सुभाष धूलिया।तथ्य, विश्लेषण और विचारसमाचार लेखन का सबसे पहला सिद्धांत और आदर्श यह है कि तथ्यों से कोई छेड़छाड़ न की जाए। एक पत्रकार का दृष्टिïकोण तथ्यों से निर्धारित हो। तथ्यात्मकता, सत्यात्मकता और वस्तुपरकता में अंतर है। तथ्य अगर पूरी सच्चाई उजागर नहीं करते तो वे सत्यनिष्ठï तथ्य नहीं हैं। लेकिन समाचार लेखन का बुनियादी सिद्धांत है कि इसका लेखन तथ्यों पर ही केंद्रित होना चाहिए। समाचार में विचारों के लिए कोई स्थान नहीं होता। समाचारों में अगर तथ्य प्रभुत्वकारी होते हैं तो संपादकीय में विचार अहम होते हैं। इस तरह एक तथ्यात्मक समाचार से एक विचारोत्तेजक संपादकीय के बीच…
गोविंद सिंह।साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक अटूट रिश्ता रहा है। एक ज़माना वह था जब इन दोनों को एक-दूसरे का पर्याय समझा जाता था। ज्यादातर पत्रकार साहित्यकार थे और ज्यादातर साहित्यकार पत्रकार। पत्रकारिता में प्रवेश की पहली शर्त ही यह हुआ करती थी कि उसकी देहरी में कदम रखने वाले व्यक्ति का रुझान साहित्य की ओर हो। लेकिन पिछले दो दशकों से इस रिश्ते में एक दरार आ गयी है। और यह दरार लगातार चौड़ी हो रही है। इसलिए आज की पत्रकारिता पर यह आरोप लग रहा है कि वह साहित्य की उपेक्षा कर रही है।जब उसे साहित्य की…
रोशन मस्ताना।नित नए बदलते परिवेश व तकनीक के साथ ही पत्रकारिता का स्वरूप भी बदला है । आज के परिवेश में समाचार बिजली की गति के साथ एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच रहा है। जहां आज विश्व में मुद्रित समाचार पत्रों का चलन कम हुआ है । वहीं भारत में समाचार पत्रों की बिक्री व पाठक संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है व भारत में समाचार पत्रों की विश्वसनीयता में कोई कमी नहीं महसूस की जा रही है । पत्रकारिता के इस दौर में इन्टरनेट में अहम् भूमिका निभाई है। आज हमारे पास ऐसे अनगिनत स्त्रोत है जिनसे…
आनंद प्रधान।भारतीय न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनल एक बार फिर गलत कारणों से अंतर्राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में हैं। 25 अप्रैल को नेपाल में आए जबरदस्त भूकंप के बाद वहां कवरेज करने पहुंचे भारतीय न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के एक बड़े हिस्से के असंवेदनशील और कई मामलों में गैर जिम्मेदाराना कवरेज से नेपाली नागरिकों के अच्छे-खासे हिस्से में गुस्सा भड़क उठा। उनकी शिकायत थी कि भारतीय मीडिया खासकर न्यूज चैनलों का कवरेज न सिर्फ असंवेदनशील, सनसनीखेज, गैर-जिम्मेदार और बचकाना था बल्कि भारत के बचाव और राहत कार्यों का अतिरेकपूर्ण प्रचार था।कुछ इस हद तक कि वहां राहत और बचाव जो भी…
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