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Author: newswriters
गोविंद सिंह।साहित्य और पत्रकारिता के बीच एक अटूट रिश्ता रहा है। एक ज़माना वह था जब इन दोनों को एक-दूसरे का पर्याय समझा जाता था। ज्यादातर पत्रकार साहित्यकार थे और ज्यादातर साहित्यकार पत्रकार। पत्रकारिता में प्रवेश की पहली शर्त ही यह हुआ करती थी कि उसकी देहरी में कदम रखने वाले व्यक्ति का रुझान साहित्य की ओर हो। लेकिन पिछले दो दशकों से इस रिश्ते में एक दरार आ गयी है। और यह दरार लगातार चौड़ी हो रही है। इसलिए आज की पत्रकारिता पर यह आरोप लग रहा है कि वह साहित्य की उपेक्षा कर रही है।जब उसे साहित्य की…
रोशन मस्ताना।नित नए बदलते परिवेश व तकनीक के साथ ही पत्रकारिता का स्वरूप भी बदला है । आज के परिवेश में समाचार बिजली की गति के साथ एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच रहा है। जहां आज विश्व में मुद्रित समाचार पत्रों का चलन कम हुआ है । वहीं भारत में समाचार पत्रों की बिक्री व पाठक संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है व भारत में समाचार पत्रों की विश्वसनीयता में कोई कमी नहीं महसूस की जा रही है । पत्रकारिता के इस दौर में इन्टरनेट में अहम् भूमिका निभाई है। आज हमारे पास ऐसे अनगिनत स्त्रोत है जिनसे…
आनंद प्रधान।भारतीय न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनल एक बार फिर गलत कारणों से अंतर्राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में हैं। 25 अप्रैल को नेपाल में आए जबरदस्त भूकंप के बाद वहां कवरेज करने पहुंचे भारतीय न्यूज मीडिया खासकर न्यूज चैनलों के एक बड़े हिस्से के असंवेदनशील और कई मामलों में गैर जिम्मेदाराना कवरेज से नेपाली नागरिकों के अच्छे-खासे हिस्से में गुस्सा भड़क उठा। उनकी शिकायत थी कि भारतीय मीडिया खासकर न्यूज चैनलों का कवरेज न सिर्फ असंवेदनशील, सनसनीखेज, गैर-जिम्मेदार और बचकाना था बल्कि भारत के बचाव और राहत कार्यों का अतिरेकपूर्ण प्रचार था।कुछ इस हद तक कि वहां राहत और बचाव जो भी…
डॉ. महर उद्दीन खां।रिपोर्टर समाचार लिखते समय उन सब बातों पर ध्यान नहीं दे पाता जो अखबार के और पाठक के लिए आवश्यक होती हैं। खबर को विस्तार देने के लिए कई बार अनावश्यक बातें भी लिख देता है। कई रिपोर्टर किसी नेता के भाषण को जैसा वह देता है उसी प्रकार सिलसिलेवार लिख देते हैं जबकि सारा भाषण खबर नहीं होता। इस भाषण से खबर के तत्व को निकाल कर उसे प्रमुखता देना सम्पादकीय विभाग का काम होता है।कोई भी खबर अखबारी कारखाने का कच्चा माल होती है और पत्रकारिता का केवल पहला चरण होती है। असल पत्रकारिता का…
मनोज कुमार।साल 1826, माह मई की 30 तारीख को ‘उदंत मार्तंड’ समाचार पत्र के प्रकाशन के साथ हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था। पराधीन भारत को स्वराज्य दिलाने की गुरुत्तर जवाबदारी तब पत्रकारिता के कांधे पर थी। कहना न होगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल अपनी जवाबदारी पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण किया, अपितु भविष्य की हिन्दी पत्रकारिता के लिये एक नयी दुनिया रचने का कार्य किया। स्वाधीन भारत में लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखने तथा सर्तक करने की जवाबदारी हिन्दी पत्रकारिता के कांधे पर थी।1947 के बाद से हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी इस जवाबदारी को निभाने का…
संजय कुमार।इसी देश में कभी अखबार का मकसद समाज-देश के प्रति समर्पण का था जो आज बाजार का हिस्सा बन गया है। जो खबरें समाज- देश- व्यवस्था-सत्ता को जगाने के लिए लिखी जाती थीं, जिन खबरों का सामाजिक सरोकार था, आज वही खबरें बेची जा रही हैं। सामाजिक सरोकार रखने वाले लोग जुड़ने वाले पत्रकार मिशन के तहत जुड़ते थे और आज व्यवसाय के तौर पर। सम्पादक खबरों का चयन करते थे आज वे प्रबंधक की भूमिका है। सम्पादक नाम की संस्था लगभग बेमानी हो चुकी हैलोकतंत्र के चौथे खंभे पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार और मीडिया हाउस की तस्वीर बदल…
स्वतंत्र मिश्र।…मूल रचनाकार अपनी रौ में लिखता जाता है, उस पर कोई बंदिश नहीं होती। लेकिन अनुवादक को रेलगाड़ी की तरह पटरी पर चलना पड़ता है‘प्रकाशक प्रति शब्द 10 या 15 पैसे देता है। इसके बाद आप उम्मीद करें कि बढ़िया अनुवाद हो जाए। क्या यह संभव है? ‘विश्व क्लासिकल साहित्य श्रृंखला (राजकमल प्रकाशन) के संपादक सत्यम के ये शब्द उस बीमारी की एक वजह बताते हैं जिसकी जकड़ में हिंदी अनुवाद की दुनिया आजकल है। अनुवाद यानी वह कला जिसकी उंगली पकड़कर एक भाषा की अभिव्यक्तियां दूसरी भाषा के संसार में जाती हैं और अपने पाठकों का दायरा फैलाती…
देवेंद्र मेवाड़ी |विज्ञान के क्षेत्र में बहुत कुछ ऐसा होता रहता है जिस पर वक्र दृष्टि से बात की जा सकती है ताकि वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक नीतिकारों को जगाया जा सके। इसलिए इस विधा में लिखने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, वैज्ञानिक नीतियों और वैज्ञानिक वर्ग के आचार–व्यवहार पर सीधी मगर पैनी व आड़ी–तिरछी नजर जरूर रखनी चाहिएसंपादकीयः अगर आप समाचारपत्र में काम करते हैं तो संपादक आपसे विज्ञान के किसी ज्वलंत या सामाजिक मुद्दे पर तत्काल संपादकीय लिखने की अपेक्षा कर सकते हैं। संपादकीय ऐसे मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी है। इससे समाचारपत्र द्वारा उस वैज्ञानिक विषय या घटना को दिए…
प्रियंका दुबे।…स्ट्रिंगर और स्थानीय पत्रकार मुट्ठीभर पैसों के लिए हर रोज अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगाते हैं, ज्यादातर खबरें सिर्फ स्व-प्रेरणा और बदलाव के लिए पैशन की वजह से की जाती हैं। तो फिर तमाम खतरों और कम तनख्वाह के बावजूद पत्रकारिता का बोझ हर रोज अपने कंधों पर उठाने वाले स्ट्रिंगर को स्वास्थ और सुरक्षा जैसी सुविधाएं दिए जाने के लिए लड़ाई आखिर कब शुरू होगी?साल 2011 की गर्मियों में दमोह से छतरपुर को जोड़ने वाले उबड़-खाबड़ सड़कों पर लगभग हर दस मीटर में बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद थे। नर्मदा घाटी के जंगलों में खड़े विशाल टीक के पेड़ों…
मुकुल व्यास |याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद दूसरे दिन कुछ अखबारों के शीर्षक गौर करने लायक थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा, ‘नाइट विदाउट एंड, डेथ एट डॉन’। हिंदू ने शीर्षक दिया, ‘याकूब मेमन हैंग्ड ऑन बर्थडे’। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक था, ‘एंड दे हैंग्ड याकूब मेमन’ जबकि नवभारत टाइम्स ने कहा, ‘इस रात की सुबह हुई’।स्पष्ट है कि ये शीर्षक गहन विचार मंथन के बाद ही चुने गए होंगे। खबरों पर शीर्षक लगाना आसान नहीं है, खासकर जब कोई मामला पेचीदगियों से भरा हो, विवादास्पद हो या संवेदनशील हो। बड़े अखबार अक्सर अपने शीर्षकों के जरिए…
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