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Author: newswriters
देवेंद्र मेवाड़ी |विज्ञान के क्षेत्र में बहुत कुछ ऐसा होता रहता है जिस पर वक्र दृष्टि से बात की जा सकती है ताकि वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक नीतिकारों को जगाया जा सके। इसलिए इस विधा में लिखने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, वैज्ञानिक नीतियों और वैज्ञानिक वर्ग के आचार–व्यवहार पर सीधी मगर पैनी व आड़ी–तिरछी नजर जरूर रखनी चाहिएसंपादकीयः अगर आप समाचारपत्र में काम करते हैं तो संपादक आपसे विज्ञान के किसी ज्वलंत या सामाजिक मुद्दे पर तत्काल संपादकीय लिखने की अपेक्षा कर सकते हैं। संपादकीय ऐसे मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी है। इससे समाचारपत्र द्वारा उस वैज्ञानिक विषय या घटना को दिए…
प्रियंका दुबे।…स्ट्रिंगर और स्थानीय पत्रकार मुट्ठीभर पैसों के लिए हर रोज अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगाते हैं, ज्यादातर खबरें सिर्फ स्व-प्रेरणा और बदलाव के लिए पैशन की वजह से की जाती हैं। तो फिर तमाम खतरों और कम तनख्वाह के बावजूद पत्रकारिता का बोझ हर रोज अपने कंधों पर उठाने वाले स्ट्रिंगर को स्वास्थ और सुरक्षा जैसी सुविधाएं दिए जाने के लिए लड़ाई आखिर कब शुरू होगी?साल 2011 की गर्मियों में दमोह से छतरपुर को जोड़ने वाले उबड़-खाबड़ सड़कों पर लगभग हर दस मीटर में बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद थे। नर्मदा घाटी के जंगलों में खड़े विशाल टीक के पेड़ों…
मुकुल व्यास |याकूब मेमन को फांसी दिए जाने के बाद दूसरे दिन कुछ अखबारों के शीर्षक गौर करने लायक थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा, ‘नाइट विदाउट एंड, डेथ एट डॉन’। हिंदू ने शीर्षक दिया, ‘याकूब मेमन हैंग्ड ऑन बर्थडे’। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक था, ‘एंड दे हैंग्ड याकूब मेमन’ जबकि नवभारत टाइम्स ने कहा, ‘इस रात की सुबह हुई’।स्पष्ट है कि ये शीर्षक गहन विचार मंथन के बाद ही चुने गए होंगे। खबरों पर शीर्षक लगाना आसान नहीं है, खासकर जब कोई मामला पेचीदगियों से भरा हो, विवादास्पद हो या संवेदनशील हो। बड़े अखबार अक्सर अपने शीर्षकों के जरिए…
मुकेश कुमार।…नियमन की वकालत करने का मतलब अकसर ये निकाला जाता है या इसे इस तरह से प्रचारित भी किया गया है मानो ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित-बाधित करने का प्रयास हो। वास्तव में उल्टा है। मीडिया स्वछंदता में धारा 19-1-ए के तहत भारतीय नागरिकों को मिले संवैधानिक अधिकार का तरह-तरह से दुरुपयोग कर रहा है। यही नहीं, इसके साथ जो दायित्व जुड़े हुए हैं, उनकी अवहेलना भी वह किए जा रहा है। उसकी इस प्रवृत्ति ने मीडिया की साख को बेहद कमजोर किया है और जाहिर है कि अभूतपूर्व विस्तार के जरिए शक्ति हासिल करने के बावजूद वह…
प्रियंका कौशल।नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में हर दूसरे दिन नक्सलियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच मुठभेड़ की खबरें आती रहती हैं। इस खूनी संघर्ष में पत्रकारों की जान पर खतरा बना रहता है. ऐसे में यहां निष्पक्ष पत्रकारिता कर पाना मुश्किलों भरा है।पत्रकार नक्सल प्रभावित इलाकों से न सिर्फ समाचार भेजता है बल्कि कई बार तो उन्हें जवानों के क्षत-विक्षत शवों को भी गंतव्य तक पहुंचाना पड़ता है। 17 अप्रैल 2015 की एक घटना है। दक्षिण बस्तर के पामेड़ पुलिस थाने के तहत आने वाले नक्सल क्षेत्र कंवरगट्टा में पुलिस और नक्सलियों की मुठभेड़ हुई थी। इसमें आंध्र प्रदेश के ग्रे…
डॉ. सुशील उपाध्याय।मौजूदा मीडिया पर जब आप एक सरसरी निगाह डालते हैं तो भौचक्का हुए बिना नहीं रह सकते। हर रोज देखते हैं कि हमारे टीवी चैनल रेडियो की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वे बहुत लाउड हैं। जैसे सब कुछ शब्दों के जरिये ही कह देना चाहते हैं। अक्सर ऐसा लगता है कि वे अपने मीडिया-माध्यम को ही बेमतलब बनाने पर तुले हैं। बात यहीं पर खत्म नहीं होती। फिल्म माध्यम टीवी की तरह हो गया है। हमेशा बोलते रहना ही सब कुछ मान लिया गया है। जबकि, जरूरत इस बात की है कि जो मीडिया जिसके लिए बना…
डॉ. महर उद्दीन खां।माली जिस प्रकार गुलदस्ते का आकर्षक बनाने के लिए सुंदर-सुंदर फूलों का चयन करता है उसी प्रकार पत्रकार को भी अपनी खबर के गुलदस्ते को आकर्षक बनाने के लिए सुंदर, संक्षिप्त और सरल शब्दों का चयन करना चाहिए। भारी भरकम शब्दों के प्रयोग से खबर बोझिल हो जाती है और फिर वह गुलदस्ता न रह कर कचरा पेटी बन जाती है। उदाहरण स्वरुप अगर फायर ब्रिगेड या अग्निशमन दल के स्थान पर दमकल लिखा जाए तो ठीक रहेगा। आज अखबारों में कलम से लिखने का चलन समाप्त हो रहा है। अधिकांश पत्रकार कम्प्यूटर पर सीधे लिखते हैं।…
मनोज कुमार।पत्रकारिता में भाषा की शुद्धता पहली शर्त होती है। यह स्मरण रखा जाना चाहिये कि समाचार पत्र समाज के लिये एक नि:शुल्क पाठशाला होती है। समाचार पत्रों के माध्यम से हर उम्र वर्ग के लोग अक्षर ज्ञान प्राप्त करते हैंसंडे स्पेशल शीर्षक देखकर आपके मन में गुदगुदी होना स्वाभाविक है। संडे यानि इतवार और स्पेशल मतलब खास यानि इतवार के दिन कुछ खास और इस खास से सीधा मतलब खाने से होता है लेकिन इन दिनों मीडिया में संडे स्पेशल का चलन शुरू हो गया है। संडे स्पेशल स्टोरी इस तरह प्रस्तुत की जाती है मानो पाठकों को खबर…
अन्नू आनंद।बाजारी ताकतों का पत्रकारिता पर प्रभाव निरंतर बढ़ा है। प्रिंट माध्यम हो या इलेक्ट्रॉनिक अब विषय-वस्तु (कंटेंट) का निर्धारण भी प्रायः मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है। कभीसंपादकीय मसलों पर विज्ञापन या मार्केटिंग विभाग का हस्तक्षेप बेहद बड़ी बात मानी जाती थी।प्रबंधन विभाग संपादकीय विषयों पर अगर कभी राय-मशविरा देने की गुस्ताखी भी करते थे तो वहएक चर्चा या विवाद का विषय बन जाता था और यह बात पत्रकारिता की नैतिकता के खिलाफमानी जाती थी।लेकिन यह बातें अब अतीत बन चुकी हैं। अब अखबार या चैनल के पूरे कंटेंट में मार्केटिंग वालोंका दबदबा अधिक दिखाई पड़ता है।…
संजय कुमार।हालांकि, इलैक्टोनिक मीडिया में आम बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। इसके पीछे तर्क साफ है कि लोगों को तुंरत दिखाया/सुनाया जाता है यहाँ अखबार की तरह आराम से खबर को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है। इसलिए रेडियो और टी.वी. की भाषा सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को अपनाया जाता है। कई अखबारों ने भी इस प्रारूप को अपनाया है खासकर हिन्दी के पाठकों को ध्यान में रख कर भाषा का प्रयोग होने लगा है।शुरुआती दौर की हिन्दी पत्रकारिता की भाषा साहित्य की भाषा को ओढे हुए थी। ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता साहित्य के बहुत करीब…
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