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Author: newswriters
संदीप कुमारटीवी न्यूज का फॉर्मेट, प्रिंट मीडिया के मुकाबले बिल्कुल अलग होता है। यहां शब्दों, कॉलम, पेज में बात नहीं होती बल्कि फ्रेम्स, सेकंड्स, मिनट्स का खेल होता है। प्रिंट में कहा जाता है कि इस खबर को दो कॉलम में ले लो, सिंगल कॉलम में रख लो, तीन कॉलम में ले लो, लीड बना लो, बैनर बना लो, बॉटम एंकर ले लो, बॉक्स में रख लो आदि–आदि।प्रिंट में खबरों को पेश करने के इनफॉर्मेट्स से अलग टीवी न्यूज के फॉर्मेट होते हैं।टीवी मीडिया के न्यूज फॉर्मेट पर हम अलग–अलग और विस्तार से चर्चा करेंगे।हेडलाइंसहेडलाइंस टीवी मीडिया का फ्रंट पेज…
आलोक वर्मा।खबर को अगर आम लोगों के बीच की आम भावनाओं में डालकर आप लिख सकें तो आपकी खबर का असर बढ़ जाएगा। देखिए खबरों में भी कहानियां ही होती हैं- घर वापसी की खबर, जीत की खबर, हार की खबर, मुश्किलों की खबर- ये सब खबरें कहीं न कहीं भावनाएं रखती हैं- इन भावनाओं को पकडक़र न्यूज लिखना एक कला है पर अगर आपने ये सीख लिया तो आप एक शानदार पत्रकार तो रहेंगे ही, एक शानदार लेखक भी कहलाएंगेटीवी न्यूज के पर्दे पर दिखाई पड़ती है, इसे पर्दे तक पहुंचाने के लिए एक कैमरे की जरूरत पड़ती है,…
नीरज कुमार।वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार बताते हैं कि जब उन्होंने एनडीटीवी ज्वाइंन किया तो चैनल के स्टूडियो में आकर उन्हें लगा कि वो जैसे नासा में आ गए हैं… रवीश कुमार के अनुभव का जिक्र उन युवाओं के लिए हैं, जो टीवी पत्रकार बनना चाहते हैं। लेकिन, न्यूज चैनल के सेट अप से वाकिफ नहीं है। लिहाजा, न्यूज चैनल में काम का फ्लो और बुनियादी तकनीकी जानकारी हो तो शुरुआती दौर में काम आसान हो जाता है।ख़बर घटनास्थल से टीवी स्क्रीन पर पहुंचने के क्रम में कई स्तरों से गुजरती है। ये सवाल अहम है कि ख़बर न्यूज चैनल…
मनोरंजन भारती |मैनें उन गिने चुने लोगों में से जिसने अपने कैरियर की शुरूआत टीवी से की। हां, आईआईएससी में पढ़ने के दौरान कई अखबारों के लिए फ्री लांसिंग जरूर की। लेकिन संस्थान से निकलते ही विनोद दुआ के परख कार्यक्रम में नौकरी मिल गई। यह कार्यक्रम दूरदर्शन पर हफ्ते में एक बार प्रसारित होता था। कहानी से पहले तीन दिन रिसर्च करना पड़ता था। बस या ऑटो से लेकर लाइब्रेरी की खाक छाननी पड़ती थी वो गूगल का जमाना तो था नहीं। फिर इंटरव्यू वगैरहा करने के बाद पहले कहानी को डिजिटल एडिटिंग की जाती थी और तब स्क्रिप्ट…
What is DocumentaryMODES OF DOCUMENTARIES-F Documentary is to document with evidence something that has actually happened by using actuality footage or reconstructions.The essential element of a good documentary is simply, the story. The audience must have an intellectual and emotional tie to the filmBasic elements: literary design, visual design, cinematography, editing, and sound designWhat is DocumentaryMain Film GenresAction FilmsBiographical Films (or “Biopics”)Animated FilmsDrama FilmsDisaster FilmsCult FilmsEpics/Historical FilmsFantasy FilmsDocumentary FilmsHorror FilmsSerial Films
क़मर वहीद नक़वी |‘आज तक’ का नाम कैसे पड़ा ‘आज तक?’ बड़ी दिलचस्प कहानी है. बात मई 1995 की है. उन दिनों मैं ‘नवभारत टाइम्स,’ जयपुर का उप-स्थानीय सम्पादक था. पदनाम ज़रूर उप-स्थानीय सम्पादक था, लेकिन 1993 के आख़िर से मैं सम्पादक के तौर पर ही अख़बार का काम देख रहा था. एक दिन एस. पी. सिंह का फ़ोन आया. उन्होंने बताया कि इंडिया टुडे ग्रुप को डीडी मेट्रो चैनल पर 20 मिनट की हिन्दी बुलेटिन करनी है. बुलेटिन की भाषा को लेकर वे लोग काफ़ी चिन्तित हैं. क्या आप यह ज़िम्मा ले पायेंगे. मेरे हाँ कहने पर बोले कि…
शैलेश और डॉ. ब्रजमोहन।न्यूज को घटनास्थल से इकट्ठा करने का काम संवाददाता (रिपोर्टर) करता है। हर न्यूज ऑर्गेनाइजेशन में रिपोर्टरों की फौज होती है और अनुभव के आधार पर उनके पद और काम तय होते हैं। टेलीविजन न्यूज ऑर्गेनाइजेशन में भी सीनियरिटी के आधार पर रिपोर्टर के कई पद होते है।ट्रेनी रिपोर्टर- जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी न्यूज चैनल में ट्रेनी रिपोर्टर के तौर पर अपना कैरियर शुरू करता है। ट्रेनी रिपोर्टर को आमतौर पर कोई बड़ा काम नहीं सौंपा जाता, उसे जनरल विजुअल शूट कराने, किसी की बाइट लाने य सीनियर रिपोर्टरों की स्टोरी…
आलोक वर्मा।एक अच्छी स्क्रिप्ट वही है जो तस्वीरों के साथ तालमेल बनाकर रखे। आपको ये बात तो पता ही होगी कि मानव मस्तिष्क का दांया हिस्सा तस्वीरों को रचता और गढ़ता है जबकि मस्तिष्क का बायां हिस्सा भाषा को संभालता है- दोनों मस्तिष्कों का सही संतुलन कायम रहना एक अच्छी स्क्रिप्ट में झलकता है, अगर तस्वीरों और शब्दों में तालमेल न बैठा तो लोग तस्वीरें ही देखते रहेंगे और आपका स्क्रिप्ट का कोई मोल नहीं होगाक्या टीवी न्यूज की स्क्रिप्ट सोचे समझे तकनीकी तरीके से लिखी जाती है? क्या स्क्रिप्ट का ढांचा बनाने के लिए शब्दों और वाक्यों को किसी…
कुमार कौस्तुभ…साल 2013 में भारत के हिंदी न्यूज़ चैनल एबीपी न्य़ूज़ पर प्रसारित कार्यक्रम प्रधानमंत्री की बेहद तारीफ हुई। भारत की स्वाधीनता के बाद के राजनीतिक-एतिहासिक परिदृश्य पर बनाया गया ये कार्यक्रम कई वजहों से काबिले-तारीफ भी रहा और काबिले-गौर भी। मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर की एंकरिंग ने देश के राजनीतिक-एतिहासिक घटनाक्रम को बड़े सलीके से बांधा। वहीं, कार्यक्रम की सधी हुई स्क्रिप्टिंग ने घटनाक्रम के प्रमुख बिंदुओं को बड़े ही सुंदर तरीके से उभारने की कोशिश की। इसी दौर में आजतक चैनल की ओर से कबीर बेदी ने वंदे मातरम नाम का कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसकी उतनी तारीफ तो…
फ़िरदौस ख़ानऑल इंडिया रेडियो से हमारा दिल का या यूं कहें कि रूह का रिश्ता है। ये हमारी ज़िन्दगी का एक अटूट हिस्सा है। रेडियो सुनते हुए हम बड़े हुये। बाद में रेडियो से जुड़ना हुआ। यह हमारी ख़ुशनसीबी थी। ऑल इंडिया रेडियो पर हमारा पहला कार्यक्रम 21 दिसम्बर 1996 को प्रसारित हुआ था। इसकी रिकॉर्डिंग 15 दिसम्बर को हुई थी। कार्यक्रम का नाम था उर्दू कविता पाठ। इसमें हमने अपनी ग़ज़लें पेश की थीं। उस दिन घर में सब कितने ख़ुश थे। पापा की ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। रेडियो से हमारी न जाने कितनी ख़ूबसूरत…
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