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Author: newswriters
दिलीप ख़ान |2010 में अमेरिका में गैलप वर्ल्ड रेलिजन सर्वे में दिलचस्प नतीजे सामने आए। सर्वे में अमेरिका के अलग-अलग प्रांतों के लोगों से धर्म और उनके अनुयाइयों के बारे में सवाल पूछे गए। 63 फ़ीसदी अमेरिकियों ने माना इस्लाम के बारे में उन्हें या तो ‘ज़रा भी जानकारी’ नहीं है या फिर ‘बिल्कुल कम’ जानकारी है। सर्वे के 43 फ़ीसदी हिस्सेदारों ने कहा कि मुस्लिमों के बारे में उनके भीतर पूर्वाग्रह है। (1)इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानने वाले तबके का बड़ा हिस्सा मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित था। तो, ये पूर्वाग्रह फिर आया कहां से? आम…
विनीत उत्पल।सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है, जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है।…
डॉ. महर उद्दीन खां |भारत गांवों का देश है। शिक्षा के प्रसार के साथ अब गांवों में भी अखबारों और अन्य संचार माध्यमों की पहुंच हो गई है। अब गांव के लोग भी समाचारों में रुचि लेने लगे हैं। यही कारण है कि अब अखबारों में गांव की खबरों को महत्व दिया जाने लगा है। अखबारों का प्रयास होता है कि संवाददाता यदि ग्रामीण पृष्ठभूमि का हो तो अधिक उपयोगी होगा। हर गांव एक खबर होता है और इस एक खबर के अंदर अनेक खबरें होती हैं। पत्रकार यदि समय समय गांव का दौरा करते रहें और वहां के निवासियों…
अतुल सिन्हा |टेलीविज़न में स्क्रिप्टिंग को लेकर हमेशा से ही एक असमंजस की स्थिति रही है। अच्छी स्क्रिप्टिंग कैसे हो, कौन सी ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए जो दर्शकों को पसंद आए और भाषा के मानकों पर कैसी स्क्रिप्ट खरी उतरे, इसे लेकर उलझन बरकरार है। हम लंबे समय से यही कहते आए हैं कि भारत में टेलीविज़न प्रयोग के दौर से गुज़र रहा है। ये धारणा बना दी गई है कि भाषा से लेकर, स्क्रिप्टिंग और पैकेजिंग तक में हमारे चैनल अभी कच्चे हैं और हमें उन चैनलों से सीखना चाहिए जिन्होंने विदेशों में लंबे समय से अपनी…
अतुल सिन्हा।आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि देश में साहित्य, संस्कृति, विकास से जुड़ी खबरें या लोगों में सकारात्मक सोच भरने वाले कंटेट नहीं दिखाए जा सकते? कौन सा ऐसा दबाव है जो मीडिया को नेताओं के इर्द गिर्द घूमने या फिर रेटिंग के नाम पर जबरन ‘कुछ भी’ परोसनेको मजबूर करता है?आम तौर पर मीडिया जगत में और खासकर टीवी पत्रकारों में ये धारणा बन गई है कि राजनीति या अपराध की ख़बरों के बगैर पत्रकारिता नहीं हो सकती। टीवी चैनलों के तकरीबन 80 फीसदी कंटेंट इन्हीं दो क्षेत्रों के इर्द गिर्द दिखाई पड़ते हैं – नेताओं के बयानों…
प्रियदर्शन।हिन्दी और भाषाई मीडिया के लिए यह विडंबना दोहरी है। जो शासक और नीति-नियंता भारत है, वह अंग्रेजी बोलता है। इस अंग्रेजी बोलने वाले समाज के लिए साधनों की कमी नहीं है। वह इस देश की राजनीति चलाता है, वह इस देश में संस्कृति और साहित्य के मूल्य तय करता है, वह इस देश का मीडिया चलाता है। वह हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषाओं को इसलिए जगह देता है कि उसे बाकी भारत से भी संवाद करना पड़ता है। लेकिन वह इन भाषाओं को हिकारत से भी देखता हैसमकालीन हिन्दी मीडिया की चुनौतियां पर इतनी बार और इतनी तरह से…
मधुरेन्द्र सिन्हा।टेक्नोलॉजी ने दुनिया की तस्वीर बदल दी है। ऐसे में पत्रकारिता भला कैसे अछूती रहती। यह टेक्नोलॉजी का ही कमाल है कि दुनिया के किसी भी कोने की घटना की खबर पलक झपकते ही सारे विश्व में फैल जाती है। दरअसल पत्रकारिता संवाद का दूसरा नाम ही तो है। मनुष्य के सभी कुछ जानने की प्रवृति या उसकी जिज्ञासा ने जिस पत्रकारिता को जन्म दिया, आज उसमें बहुआयामी बदलाव हो चुके हैं। कंप्यूटर ने इसमें गज़ब का बदलाव किया और पत्रकारिता के सुर और तेवर सब कुछ बदल गए। आज सिर्फ भारत में हजारों पत्र-पत्रिकाएं निकलती हैं तो सैकड़ों…
मनोज कुमार |इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा है, वह…
मुकुल व्यास..सुबह चाय की चुस्कियों के साथ आप जिस अखबार का आनंद लेते हैं उसे बंनाने के लिए बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है। संपादक के नेतृत्व में पत्रकारों की एक सुव्यवस्थित टीम इस अखबार का निर्माण करती है। पत्रकारों की टीम को अलग-अलग विभागों में विभाजित किया जाता है। ये विभाग हैं मुख्य डेस्क,समाचार ब्यूरो, स्थानीय ब्यूरो,स्थानीय डेस्क, संपादकीय डेस्क,वाणिज्य डेस्क ,खेल डेस्क, रविवासरीय और फीचर डेस्क। इनके अलावा अखबार के कार्यालय में डिजाइन विभाग, फोटो विभाग और संदर्भ सामग्री विभाग भी होते हैं। समाचार ब्यूरो और स्थानीय ब्यूरो को छोड़ कर हर डेस्क उप-संपादकों द्वारा संचालित किया जाता…
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